

आत्मतत्त्व गोकर्णलिंग
श्री गोकर्णनाथ
वराह, स्कंध एवं शिव पुराण के अनुसार, तारकामय देवासुर संग्राम समाप्त हो चुका था और देवताओं ने पुनः दानवों पर विजय प्राप्त की थी। एक बार सनतकुमार ने ब्रह्मा जी से पूछा—महादेव ने मृग रूप क्यों धारण किया और उत्तर गोकर्ण, दक्षिण गोकर्ण तथा श्रृंगेश्वर धाम की स्थापना कैसे हुई? ब्रह्मा जी ने बताया कि नंदी मुनि ने घोर तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया। शिव ने उन्हें अपनी अनन्य भक्ति का वरदान दिया और कहा कि वे सदैव उनके प्रत्येक धाम के अग्रभाग में पूजे जाएंगे। नंदी के दिव्य तेज से चिंतित होकर देवता महादेव की खोज में निकले। तीनों लोकों को घूमने के उपरांत वह हिमालय की तलहटी के विशाल श्लेष्मातक वन पहुंचे जहां उन्हें एक दिव्य स्वर्णिम मृग दिखाई दिया। विष्णु जी ने पहचान लिया कि वही महादेव हैं। जैसे ही देवताओं ने उसे पकड़ना चाहा, मृगरूपी शिव अंतर्ध्यान हो गए और उनके दिव्य श्रृंग के तीन भाग हो गए। श्रृंग का अर्थ होता है सींग। अग्र भाग देवराज इंद्र को मिला, मध्य भाग ब्रह्मा जी और मूल भाग भगवान विष्णु को मिला।
तब महादेव ने आकाशवाणी की, कि इन तीनों भागों को मेरे आत्मतत्व के रूप में स्थापित करदो यह पृथ्वी में मेरे कानों के सामान होंगे यहां जो भी भक्त मुझे सच्चे मन से पुकारेगा, उसकी प्रार्थना मैं स्वयं सुनूंगा। ‘गो’ जिसका अर्थ है पृथ्वी और ‘कर्ण’ जिसका अर्थ है कान। ये तीनों स्थानों पर आत्मतत्व गोकर्ण लिंग के रूप में स्थापित रहूंगा।
तत्पश्चात, देवताओं द्वारा मूल भाग को उत्तर गोकर्ण यानि गोला गोकर्णनाथ में स्थापित किया गया, मध्य भाग बागमती तट पर श्रृंगेश्वर में स्थापित किया जो वर्तमान में सिंहेश्वर के रूप में प्रसिद्ध है और बिहार राज्य के मधेपुरा में स्थित है और अग्र भाग देवताओं द्वारा स्वर्ग में। कालांतर में जब रावण के पुत्र मेघनाद ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त की, तो देवराज इंद्र के पास स्वर्ग में स्थापित श्रृंग के अग्र भाग को दशानन रावण लंका ले जाने लगा। लेकिन समुद्र तट पर संध्या-वंदन के लिए उसे भूमि पर रखते ही वह अचल हो गया। रावण ने अपने महाबल से उसे उखाड़ने का प्रयास किया, पर सफल न हो सका। तभी से वह स्थान महाबलेश्वर या दक्षिण गोकर्ण कहलाया जो वर्तमान समय कर्नाटक राज्य में स्थित है। इसीलिए पुराणों में इन्हें आत्मतत्त्व गोकर्णलिंग कहा गया है। गोला गोकर्णनाथ में स्थापित विग्रह उसी दिव्य श्रृंग का मूल भाग है, जहाँ भक्तों की पुकार सीधे महादेव तक पहुँचती है।


















